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Deepak Dogra
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  • हरियाणा में गिरजाघर पर हमले के बाद तनाव

    00.00.0000 | हरियाणा के हिसार जिले में बीते दिनों एक निर्माणाधीन गिरजाघर पर हुए हमले, तोड़फोड़ और चर्च परिसर में हिंदू भगवान हनुमान की प्रतिमा को रखने की घटना के बाद क्षेत्र में तनाव है। पुलिस ने इस मामले में 14 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। पुलिस ने हालात को और बदतर बनने से से रोकने के लिए बाद में गिरजाघर परिसर से भगवान हनुमान की प्रतिमा और भगवान राम से संबंधित लाल झंडा हटा लिया।पुलिस अधिकारियों ने सोमवार को बताया कि हिसार जिले में कैमरी गांव के गिरजाघर के पादरी की शिकायत पर 14 लोगों के खिलाफ दंगा करने, अराधनालय में तोड़ फोड़, चोरी और वैमनस्य फैलाने के मामले दर्ज किए गए हैं। घटना छह मार्च की है। हालांकि अब तक इस मामले में किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है।हमलावरों ने निर्माणाधीन गिरजाघर में क्रॉस को तोड़ दिया और वहां खा सामान भी ले गए।पादरी ने मीडिया को बताया कि बजरंग दल के कुछ कार्यकर्ताओं और कुछ दूसरे लोगों ने पहले भी उन्हें धमकी दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि हमले के पीछे वही लोग हो सकते हैं।पादरी सुभाष चंद ने कहा, "बजरंग दल के लोगों और कुछ स्थानीय लोगों ने पिछले महीने मुझे धमकी दी थी।"हरियाणा में बीते अक्टूबर महीने से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार है।स्थानीय लोगों का आरोप है कि पूरे गांव में एक भी ईसाई नहीं होने की बात जानते हुए भी पादरी ने गांव में गिरजाघर बनाने की कोशिश की।ग्रामीणों का कहना है कि पादरी गांव के और आसपास के लोगों को धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश कर रहे थे।स्थानीय लोगों ने घटना की बाबत सोमवार को पंचायत की बैठक बुलाई। वे इस मामले में किसी की भी गिरफ्तारी का विरोध कर सकते हैं।एक ग्रामीण ने बताया, "पादरी बेवजह मामले को जटिल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कुछ पूर्व सरपंचों के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज करवाया है, जिन्हें हम अब जानते भी नहीं हैं। वह गैरकानूनी रूप से गांव में गिरजाघर बनवा रहे थे और धर्म परिवर्तन के माध्यम से माहौल बिगाड़ रहे थे।"

  • शरीर ही है धर्म का साधन

    06.05.2015 | तुम सत्संग में गए और वहां पर तुमने समाधि के बारे में सुना। पर क्या एक दिन में समाधि सम्भव है? तुमने ज्ञान सुना, आत्मा क्या है और परमात्मा क्या है, यह जान लिया, पर इन शब्दों की परिभाषाओं का पता चलना क्या काफी है? खोज के लिए वक्त चाहिए। तप के लिए और किसी भी साधना के लिए वक्त चाहिए। अपने खुद के शरीर और मन को समझने के लिए वक्त चाहिए। अपने शरीर को साधने के लिए भी वक्त चाहिए। तो ऋषि हर समय यही प्रार्थना करता है- हे सूर्यदेव! आज से मैं सौ वर्ष जीवित रहूं। किसलिए करता है यह प्रार्थना? ऋषि यह प्रार्थना इसलिए करता है, क्योंकि सूर्य ही प्रकाश, तेज और ऊर्जा का स्रोत हैं। सूर्य की ऊर्जा से ही इस शरीर का पोषण होता है। सूर्य पर ही अन्न और वनस्पति, फल और फूल, पौधे और सभी प्राणी निर्भर हैं। दिन और रात, जीवन और मृत्यु सूर्य पर ही निर्भर हैं। अगर सूर्य ही न हों तो कुछ भी नहीं।सूर्य ही मनुष्य के इस जीवनचक्र की धुरी हैं। तुम्हारा शरीर सूर्य के कारण सक्रिय होता है और तुम्हारा मन चंद्रमा के कारण सक्रिय होता है। चंद्रमा की घटती हुई कलाओं का असर मानव के मन और मस्तिष्क पर पड़ता है। पूर्णिमा के बाद चांद घटने लग जाता है। तत्त्वचिंतक और विचारशील व्यक्तियों ने यह महसूस किया है कि जैसे-जैसे चंद्रमा की कलाएं घटती जाती हैं, वैसे-वैसे मानव-मन में उदासी, दुख, चिंताएं, परेशानी, विक्षिप्तता आदि उलझनें बढ़ने लगती हैं।चंद्रमा के कारण समुद्र में ज्वार-भाटा उत्पन्न होता है। बहुत ऊंची-ऊंची लहरें उठती हैं और बहुत गहराई में गिरती हैं। पूर्णिमा के दिन लहरों का यह उत्पात सबसे ज्यादा होता है। अगर चंद्रमा के कारण समुद्र में ज्वार-भाटे उठ सकते हैं, जो आगे तूफान में बदल सकते हैं तो ख्याल रखना कि तुम्हारे शरीर में भी 70 प्रतिशत जल ही है। अगर चंद्रमा की किरणों का इतना गहरा प्रभाव समुद्र में आ सकता है तो क्या उनका प्रभाव आपके शरीर पर नहीं आ सकता।चंद्रमा को मन का देवता कहा जाता है और सूर्य को शरीर का। शरीर को रोग-रहित रखने के लिए, अच्छे स्वास्थ्य के लिए सूर्यदेव से प्रार्थना की जाती है। हमारा शरीर सूर्य के साथ बहुत गहराई से संयुक्त है। इसी कारण ऋषियों ने यह सुझाव दिया कि सूर्य देवता शरीर के मालिक हैं, इसलिए सूर्य के उदय होने से पहले ही हाजिरी भरो। उनको प्रणाम करो। मान लो आपने अपने पूज्य गुरुदेव को घर पर आमंत्रित किया है। तो जरा सोचो कि क्या सम्भव है कि गुरु घर पर आएं और तुम उनके स्वागत के लिए घर में उपस्थित ही न हो? सूर्य देवता इस शरीर के स्वामी हैं, इस देह के गुरु हैं, इस शरीर के नाथ हैं तो उनके आकाश में उपस्थित होने से पहले ही तुम्हें उनका स्वागत करने के लिए अच्छी तरह से तैयार नहीं हो जाना चाहिए?ब्रह्म मुहूर्त के समय जगना शरीर को निरोगी और स्वस्थ रखने का सबसे अचूक साधन है। सूर्य की किरणें विशेषतः सूर्योदय के पहले 10 मिनट में सबसे ज्यादा लाभकारी होती हैं। उस समय जब आप आकाश से झरती हुई स्वास्थ्य-वर्धक किरणों में स्नान करते हो और उन किरणों से ऊर्जा का रसपान  करते हो तो आप भी सूर्य की तरह दीप्तिमान हो जाते हो। जैसे सूर्य शक्ति और तेजस्विता का पुंज हैं, ऐसे ही आप भी ओज और कांति का भंडार बन जाते हो। पाश्चात्य देशों के विद्वानों ने पहली बार जब हमारे ऋषियों की ऐसी प्रार्थनाओं के बारे में पढ़ा कि आज से मैं सौ वर्ष जीऊं, तो उन्होंने कहा कि क्या वे ऋषि डरे हुए इंसान थे? उनको क्या मृत्यु का भय था या उन लोगों में जिजीविषा अधिक थी? परंतु सत्य तो यह है कि न तो वे मृत्यु से भयभीत थे, न ही उनमें अधिक समय तक जीने की इच्छा थी और न ही अन्य कोई चिंता या वासनाएं थीं।उनका लक्ष्य सिर्फ उस अज्ञात ब्रह्म के स्वरूप को खोजना था। इसके लिए दो स्थितियां अनिवार्य थीं। एक, शरीर स्वस्थ हो, क्योंकि अगर शरीर ही अस्वस्थ हो तो तुम कुछ प्राप्त नहीं कर सकते। और दूसरा, तुम्हारे पास यथोचित पर्याप्त जीवनकाल भी हो, क्योंकि अगर जीवन ही न हो तो कुछ भी नहीं हो सकता।

  • राजा की विचित्र इच्छा से प्रकट हुआ था सृष्टि का पहला नारियल

    09.05.2015 | सनातन संस्कृति में हर शुभ संस्कार नारियल के बिना अधूरा है। यह पवित्रता, शुभ-लाभ तथा मंगलमय कामना का प्रतीक माना जाता है। क्या आप जानते हैं कि नारियल का उद्भव कैसे हुआ था? इसके पीछे एक पौराणिक कहानी बताई जाती है।प्राचीन काल में सत्यव्रत नामक एक राजा हुए थे। वे बहुत धार्मिक स्वभाव वाले और परोपकारी शासक थे। उनके जीवन की सबसे बड़ी इच्छा थी कि वे स्वर्गलोक जाएं, लेकिन स्वर्ग जाना उनके सामर्थ्य में नहीं था।उन्हीं दिनों ऋषि विश्वामित्र तपस्या कर रहे थे। तपस्या के लिए वे अपना घर-परिवार सब छोड़कर सिर्फ ईश्वर के ध्यान में रमे थे। उधर उनका परिवार कई अभावों से पीड़ित था। तब राजा सत्यव्रत ने ऋषि के परिवार की सेवा की और उन्हें जरूरत की हर वस्तु उपलब्ध कराई।काफी समय बाद जब ऋषि विश्वामित्र घर आए तो उनके परिजनों ने राजा के सेवा कार्यों के बारे में बताया। विश्वामित्र राजा के दरबार में गए और उनका आभार जताया। ऋषि विश्वामित्र सिद्ध पुरुष थे। यह बात राजा भी जानते थे। इसलिए राजा सत्यव्रत ने उनसे वरदान मांगा कि वे उन्हें स्वर्गलोक पहुंचा दें।ऋषि के लिए यह कार्य असंभव नहीं था। उन्होंने अपने तपोबल से राजा के लिए एक ऐसा मार्ग तैयार किया जो सीधा स्वर्गलोक तक जाए। यह देखकर राजा अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने स्वर्ग के लिए प्रस्थान किया लेकिन वहां पहुंचते ही देवराज इंद्र ने उन्हें पुनः धरती की ओर धकेल दिया।इंद्र के इस बर्ताव से राजा बहुत दुखी हुए। विश्वामित्र को भी क्रोध आ गया, लेकिन बाद में उन्हें एक उपाय सूझा। उन्होंने अपनी तपस्या की शक्ति से एक नए स्वर्गलोक का निर्माण करना चाहा। यह स्वर्गलोक धरती और वास्तविक स्वर्गलोक के बीच में था। ऋषि ने स्वर्ग का निर्माण कर दिया।परंतु ऋषि को एक चिंता भी थी। ब्रह्मांड में स्थित होने के कारण इसे प्राकृतिक रूप से खतरा था। इससे नया स्वर्ग धराशायी हो सकता था। तब विश्वामित्र ने इस स्वर्ग के लिए एक स्तंभ का निर्माण किया और इससे स्वर्ग को सहारा मिल गया।ऐसी मान्यता है कि बाद में वह स्तंभ पेड़ के रूप में परिवर्तित हो गया और राजा सत्यव्रत का शीश उसका फल यानी नारियल बन गया।

  • क्‍या मूर्ती के माध्‍यम से पूजा करना सही है?

    11.05.2015 | क्‍या मूर्ती के माध्‍यम से पूजा करना सही है? क्‍यूं कुछ धार्मिक ग्रंथ मूर्ती की पूजा करने का विरोध करते हैं? अगर सीधे तौर पर देखा जाए तो हम मूर्ती की पूजा नहीं करते हैं। मूर्ती, छवि या चित्र के माध्‍यम से हम भगवान की पूजा करते हैं, जो कि सर्वव्‍यापी है। छवि भगवान का प्रतीक है, यह हमारे दिमाग में भगवान की एक छवि बनाने में मदद करता है, जिससे हम उनकी मन लगा कर पूजा कर सकें।उदाहरण के तौर पर एक मां अपने छोटे से बच्‍चे को तोते का चित्र दिखा कर उसे यह बताती है कि "यह एक तोता है"। जिससे कि वह बच्‍चा जान सके कि असल में तोता कैसा दिखाई देता है। एक बार बडे़ हो जाने के बाद बच्‍चे को पक्षियों को पहचानने के लिये चित्रों की जरुरत नहीं पड़ती।इसी तहर से शुरुआत में मन को मदद करने के लिये कुछ उपकरणों की आवश्‍यकता होती है। एक बार जब इंसान आध्यात्मिक अभ्यास कर लेता है, तब उसके मन को मूर्ती या चित्र की आवश्‍यकता नहीं पड़ती। एक छवि पर फोकस कर के आप अपने दिमाग को केंद्रित करने में प्रशिक्षित करते हैं, जो कि एक अच्‍छा तरीका है।हांलाकि हम यह नहीं कह सकते हैं कि भगवान मूर्ती या छवि में मौजूद नहीं हैं। भगवान हर जीव-जन्‍तु तथा निर्जीव चीजों में प्रकट हैं इसलिये वह छवि में भी मौजूद हैं।छवि की पूजा करने से यह भी मतलब निकाला जा सकता है कि हर इंसान को हर जीव-जंतु से प्‍यार करना आना चाहिये और दुनिया में शांति फैलानी चाहिये।कुछ धर्म जो छवि पूजा का विरोध करते हैं वास्‍तव में, वह भी किसी न किस रूप में मूर्ती पूजा जरूर करते हैं। एक ईसाई यीशु की पूजा क्रॉस के माध्‍यम से करता है या फिर एक मुस्‍लिम अपनी नमाज़ काबा की ओर मुंह कर के पढ़ता है।छवि पूजा के नकारात्मक पक्ष यह होते हैं कि लोग यह समझने लगते हैं कि भगवान केवल मूर्ती में ही समाए हुए हैं। वह उसके पीछे के सिद्धांत को भूल जाता है। वह बार बार गल्‍तियां करता जाता है और मूर्ती के सामने माथा टेक कर छमा मांग लेता है।

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